“कभी कभी”
कभी कभी अच्छा लगता है
पुरानी शर्ट की जेब से निकली
वो धुधंली सी पिक्चर की टिकिट
याद दिलाता है उनके साथ बिताए घंटे
जो आज लम्हे के लिए भी तरसते हैं’
उन नाराज़ यादों को फिर से थोड़ा मना लेता हु….
जब ढूंढ़ने कुछ पहुंच जाता हु घर के बंद कमरे में
और एक पुरानी डाइरी मिलती है धुल में सनी हुई
तो फिर हाथ अपने आप उसको सहलाने लगता है
तब यादें नयी पैदा होती है अपनी लिखी हुई स्याही से
मैं आँखों को छलकने देता हु और थोड़ी नमी चुरा लेता हु ….
कभी कभी जब बस अड्डे पर खड़ा हो
देखता हु सिग्नल पर रुकी हुई बड़ी सी कार
और उसमे बैठे आदमी को सुकून से झपकिया लेते हुए
तब मन खट्टा हो जाता है, और मैं खो जाता हु
तभी दोस्त पीठ थपथपाकर खारे सिंग दाने आगे बढाता है
तब मैं उस खारे स्वाद में ज़िन्दगी की मिठास ढूंढ़ लेता हु….
जब मैं घर आता हु एक और हारे दिन से जीतकर
और तुम्हे उसी साडी में देखकर जो परसों तुमने पहनी थी
हारा हुआ महसूस करता ;हु की क्यूँ नहीं
जुटा पाया मैं तुम्हारे साजो सिंगर का सामान
पर जब मुश्कुराकर खिलाती हो सुखी रोटी का निवाला
तो तुम्हारी काँच की चूड़ियों में रंगबिरंगे पकवानों का एहसास कर लेता हु….
जब बेठता हु घर के गलियारे में और बारिश को ताकता हु
और जब बूंद पड़ती है टप्प से मेरी चाय की प्याली में
किसी के जोर से बुलाने का एहसास होता है
तो मैं मुश्कुराकर ऊपर निहारता हूँ तेज फावारो की ऑर
भूल जाता हु हिसाब कोई जोड़ रहा था, रखकर कागज़ कलम
मैं बूंदों में नहाकर धून नयी कोई बना लेता हु….
क्यूंकि जानता हु की बहुत कम है सवारने के लिए ज़िन्दगी
चाँदी के सिक्के तो खरीद नहीं पाया
पर सोने के मोल की तुम्हारी हँसी
बदहवास तेज बारिश में खिलखिलाना
नंगे पैर चलकर रिश्ता नया बाँध लेता हु
इन लम्हों को वसीहत बनाकर लिखकर तुम्हारे नाम
अपने नाम का कुछ तो बना लेता हु
थोड़ी ख़ुशी हाथ फैलाकर कैद कर लेता हु|…..





